
मां पर मुनव्वर राणा के लिखे शेरों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने शायरी कोठे से घसीट कर मां तक ला दी. एक शेर में भी उन्होंने इस बात को बखूबी बयान किया है. मदर्स डे के मौज़ू पर शायर मुनव्वर राणा ने एक ऐसा शेर लिखा था जो क़ी पूरी तरह से इस मौके पर सटीक बैठता है.
''मामूली एक कलम को कहाँ तक घसीट लाए
हम इस ग़ज़ल को कोठे से माँ तक घसीट लाए''
इसके अलावा भी मुनव्वर राणा साहेब ने मां पर शेर लिखे हैं. जिन्हें पढ़कर आप अपनी मां को याद किए बिने नहीं रह सकते. इन शेरों को पढ़कर आपकी आंखों में आंसू आ जाएंगे. इस मौके पर हम आपको पढ़ाते हैं मुनव्वर राणा द्वारा मां पर लिखे गए शेर-
ऐसे तो उससे मोहब्बत में कमी होती है,
माँ का एक दिन नहीं होता है सदी होती है
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा
मैं अपनी माँ का आखिरी ज़ेवर बना रहा
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती
बुद्ध पूर्णिमा पर किया ये काम तो नहीं होगी धन-धान्य की कमी, मानसिक परेशानी भी हो जाएगी दूर
बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है
यहीं रहूँगा कहीं उम्र भर न जाउँगा
ज़मीन माँ है इसे छोड़ कर न जाऊँगा
मैंने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़-ए-माँ रहने दिया
दिया है माँ ने मुझे दूध भी वज़ू करके
महाज़े-जंग से मैं लौट कर न जाऊँगा
दुनिया के सबसे प्यारे रिश्तों में मां और उसके बच्चे का रिश्ता होता है. यह किसी भी इंसान की जिंदगी में सबसे खास होता है. मां एक ऐसी मसीहा होती है, जो आपको हर हालात से बाहर निकालने में मदद करती है. भले ही आप अपनी मां से सैकड़ों मील दूर रहें, लेकिन वो आपकी हर आहट को अपनी चौखट पर महसूस करती है. वो आपका हर लम्हा इंतजार करती है, आपका ख्याल करती है और आपके बारे में सोचती है.